अपने हिस्से का व्क़्त सबको मिला होता है

अपने हिस्से का व्क़्त सबको मिला होता है
व्क़्त सबका नहीं फिर भी ये गिला होता है

जब कभी सोते हैं गर्दिश मे सितारे उनके
सर पे इक चाँद का पैबन्द सिला होता है

मंद हाली मे भी बारिश का मज़ा अपना है
चश्म-ए-राहत मे तर-ब-तर हर क़िला होता है

क्यों सिसकती है तितलियाँ बहार जाने से
फूल कोई तो ख़िज़ां मे भी खिला होता है

जिसने प्यालों मे भर के डाली हो अक्सर् ही शराब
आब ज़मज़म का कहाँ उसने पीला होता है

घर जलाये हों जिसने दूसरों के शोलों से
गैरत-ए-आग मे वो ही तिलमिला होता है…SONIA BHARTI