ग़मे-फ़िराक भी आख़िर फ़रोग़ पा ही गया – Mukesh Alam

ग़मे-फ़िराक भी आख़िर फ़रोग़ पा ही गया
कि फ़िक्र ढल के फ़क़ीरी में रास आ ही गया
ये राह वो है कि मिटना भी पड़ सके है यहाँ
तू शुक्र कर कि तेरा सिर्फ़ आसरा ही गया
मिली है तर्क़े-तआल्लुक से रब्ते-ग़म को बक़ा
कि अब तो मिलने-बिछुड़ने का मुद्दआ ही गया
न घर रहा, न सुकूँ, न ये ज़िन्दगी ही रही
गया है सब, न मगर दर्द या ईलाही ! गया
ये दर्दे-इश्क़ है ‘आलम’ किसी के बस में कहाँ
रहा रहा न रहा, न गया तो न ही गया
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फ़रोग़- उन्नति। तर्क़े-तआल्लुक-सम्बन्ध टूटना। रब्ते-ग़म- ग़म का रिश्ता।
बक़ा- स्थाइत्व/