जब से तुम्हारी याद बसा ली ख़्याल में – Mukesh Alam

जब से तुम्हारी याद बसा ली ख़्याल में
उड़ती है इक ख़्याल की तितली ख़्याल में
जलकर के ही रौशन उसे करना था मुनासिब
वो रात कि जो ना गई टाली ख़्याल में