प्रवीण शुक्ला – एक कवि-सम्मेलन में

एक कवि-सम्मेलन में
‘नेता जी’ मुख्य अतिथि के रूप में आये हुए थे,
परन्तु गुस्से के कारण
अपना मुँह फुलाये हुए थे ।
उपस्थित अधिकांश कवि
नेताओं के विरोध में कविता सुना रहे थे,
इसलिए, नेता जी को
बिल्कुल भी नहीं भा रहे थे ।
जब उनके भाषण का नम्बर आया
तो उन्होंने यूँ फ़रमाया-
इस देश में
बिहारी और भूषण की परम्परा का कवि
न जाने कहाँ खो गया है,
अब तो सत्ता की आलोचना करना ही
कवियों का काम हो गया है ।
मैंने कहा-
श्रद्धेय, श्रीमान जी,
हम आज भी करते हैं
आपका पूरा-पूरा सम्मान जी,
लेकिन राजनीति में
अपराधियों की बढ़ती हुई संख्या
एक ही कहानी कह रही है,
ईमानदारों की संख्या तो आजकल
मुश्किल से दो प्रतिशत ही रह रही है ।
जब आप इस प्रतिशत को
उल्टा करके दिखायेंगे,
तो हम भी एक बार फिर से
भूषण और बिहारी की
परम्परा को निभाएंगे ।
आपके सम्मान में गीत गाएंगे,
गीतों में आपका अभिनन्दन करेंगे
आपके चरणों मैं सुबह-शाम वन्दन करेंगे ।
– प्रवीण शुक्ला
साभार – हँसते हँसाते रहो